शहडोल : वन विभाग द्वारा वर्ष 2013-14 में बनाया गया वनरक्षक नाका उपेक्षा का शिकार हुआ है. इस वनरक्षक नाका में ना तो लाइट की व्यवस्था है और ना पानी की इस वनरक्षक नाका में न ही किसी वनरक्षक की तैनाती की गई है. कुछ समय पहले तक सिरौजा और करकटी का जंगल अपने सुंदरता और विशाल जंगल के रूप में जाना जाता था पर आज कहानी कुछ अलग ही है ना तो जंगल बचा है और न ही कोई कीमती लकड़ी बची है. लोगों का कहना है कि नाम मात्र का ही वनरक्षक चौकी बनी है जहां कोई अधिकारी और ना कोई वनरक्षक आते है. पास में कुछ गांव बसे हुए हैं जो जंगलों को काट रहे हैं जिससे वन में पेड़ों की संख्या आये दिन घाट रही है. इन गांव वालों का मुख्य कार्य लकड़ी काटकर बेचना और शराब बनाना है. वनरक्षक नाका पूरी तरह से जीर्ण शीर्ण हो चूका है उसमें लगे दरवाजा खिड़कियां पूरी तरह से टूट चुकी है.
मालूमात करने पर पता चला की वनरक्षक नाका के देख रेख के लिए एक व्यक्ति को चौकीदार रखा गया है. हमारे पब्लिक न्यूज़ की टीम ने जब चौकीदार से पूछा की यहाँ कोई अधिकारी आते भी है या नहीं? तो उनका जवाब था बहुत कम. ये पेड़ों की कटाई लगातार बढ़ रही है साहब को पता है भी या नहीं? तो उनका कहना था की इस बात की जानकारी साहब को है सब काम उन्ही के जानकारी में होता है.
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| देख रेख के अभाव में चारो तरफ से जंगल में तब्दील वननाका |
हमारी टीम ने चौकीदार से परिचय जानना चाहा तो कुछ और तथ्य सामने आया. चौकीदार समरू बैगा ग्राम सिरैजा निवासी का कहना है कि उसे मात्र 500 रुपए महीने दिया जाता है. वनरक्षक नाका पूरी तरह जर्जर हो चुकी है बिजली की सुविधा तक नहीं है. उन्होंने बताया की यहां से लगभग 100 मीटर की दुरी पर बिजली का खम्भा है जिससे यहाँ लाइट की सुविधा दी जा सकती है किन्तु साहब इस पर कोई विचार नहीं करते. नाका के जर्जर होने से रात में जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है. उनका कहना था की वह महज 500 रूपये की मासिक वेतन के साथ खतरों से भरा कार्य कर रहे हैं. नियमानुसार उन्हें वेतन दिया जाना चाहिए, जैसे एक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को दिया जाता है साथ ही उन्हें बिजली की सुविधा उपलब्ध कराइ जाये तथा वनरक्षक नाका का मरम्मत किया जाना चाहिए.





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